Jan. 28, 2026

Bas Ek Kitaab Aur/ Read On

Bas Ek Kitaab Aur/ Read On
Bas Ek Kitaab Aur/ Read On
Kuch Kisse Kuch Aapbeeti
Bas Ek Kitaab Aur/ Read On

Jugal, an aspiring chartered accountant, retreats to his uncle's secluded forest lodge to prepare for his exams in solitude. Instead of peace, he encounters an unexpected and beautiful distraction—books. As the forest grows quieter and the lodge darker, Jugal finds himself increasingly addicted to the stories. But who wrote those books and why was the library always so dirty!?
Written and Narrated by: Manoshi
Warm thanks to Shantanu Paul (Hari's voice) for his collaboration on this story.

0:02 कुछ किस्से कुछ आप बीती में आप सबका स्वागत है। मैं हूँ मानुषी आपकी होस्ट और इस स्टोरी पॉडकास्ट की वाचक दोस्तों, क्या कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि ढूंढने गए कुछ शर्मीला और कुछ? हम में से कई इस परिस्थिति से गुजरे हैं, जहाँ हमने तेल का ताड़ बना दिया। पर जब भावनाओं को किनारे कर दिमाग का इस्तेमाल किया तो सब शीशे की तरह साफ हो गया। कुछ ऐसा ही जुगल के साथ हुआ जब वो अपने चाचा जीके घर गया तो आइए। सुनते हैं आज की कहानी जिसका शीर्षक है बस एक किताब, और तो तू कह रहा है। तू सीए। करेगा। मकॉम में दाखिला नहीं लेगा। हाँ, माँ मैंने कॉमर्स लिया ही इसलिए। ताकि चार्टर्ड अकॉउंटेंट बन सकूँ। मेरी बीकॉम में फर्स्ट डिवीज़न मार्क्स भी है, मुझे तो डायरेक्ट अडमिशन मिल जाएगा?

1:06 लेकिन बेटा इस छोटे शहर में सीए की पढ़ाई। तभी तो आपसे कह रहा हूँ, पापा से बात करिए, उनके दूर के रिश्ते के वो भाई है ना? मनोहर चाचा वो सीए है और अहमदाबाद में उनका अपना फर्म भी है। तो तू अहमदाबाद जाकर पढ़ाई करना चाहता है, माँ। जब घर में ही सीए फर्म है, तो मुझे यहाँ वहाँ भटकने की क्या जरूरत। मेरी आर्टिकलशिप वहीं से हो जाएगी। सावित्री जी को ज्यादा तो कुछ समझ में नहीं आया पर इतना अनुमान हो गया कि अब बेटा इस छोटे शहर से निकलना चाहता है और जैसा कि अधिकतर मध्यमवर्गीय परिवारों में होता है पिता तक अपनी बात पहुंचाने के लिए। बेटी को माँ का सहारा लेना पड़ता है इसलिए इस पूरी परिस्थिति में सावित्री जी की भूमिका मात्र एक संदेश वहाँ की थी और जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। दोपहर 1:00 बजे के आसपास जुगल के पिता ने मनोहर जी को फ़ोन लगाया और पूरी बात बताई। मनोहर जी उनके सेकंड कजिन थे। दूर का रिश्ता होते हुए भी हम उम्र होने के कारण दोनों भाई काफी करीब थे। 1 साल पहले ही मनोहर जी की पत्नी का स्वर्गवास हुआ था और उनकी कोई संतान भी नहीं थी। इसलिए जब उन्हें जुगल के उनके पास जाकर सीए करने के प्रस्ताव का पता चला तो वे बहुत खुश हुए और जुगल के पिता को बिना देर किये उसे

2:41 अहमदाबाद भेजने को कहा। एक हफ्ते बाद ही अपना बोरियां बिस्तर लेकर जुगल चाचा के घर पहुँच गया। सारी सुख सुविधाओं से भरा पर रौनकहीन बड़ा सा आलीशान घर सच ही कहा है किसी ने घर ईंट पत्थर से नहीं परिवार से बनता है। जुगल के आ जाने से चाचा को भी घर में रहने का बहाना मिल गया, वरना उनका पूरा समय फॉर्म में ही गुजरता था। वे जुगल को अपने साथ आधे दिन के लिए ऑफिस ले जाते। शाम को उसके साथ बैठकर सीए की तैयारी की बारीकियां सिखाते और रात में चाचा भतीजा टीवी देखते हुए साथी खाना खाते। एक तरह से मनोहर जी को जुगल में एक पीटा मिल गया। आर्टिकल शिप का पहला महीना था। इंटरमीडिएट परीक्षा के लिए अभी बहुत समय था। जुगल जी जान से तैयारी में लगा हुआ था। 1 दिन सुबह उसने चाचा को किसी से फ़ोन पर बात करते हुए सुना। उनकी आवाज में गुस्सा और परेशानी साफ थिरक रही थी। नाश्ते के वक्त भी मनोहर जी का ध्यान कहीं और ही था। चाचा जी सब ठीक तो है ना?

3:56 अब काफी परेशान दिख रहे हैं। हाँ, हाँ, बेटा, सब ठीक है, तुम नाश्ता करो। चाचा जी दो महीने से आपके साथ हूँ। आपका चेहरा पड़ना आ गया है मुझे प्लीज़ बताइए ना क्या परेशानी है? शायद मैं कुछ मदद कर सकूँ। जुगल के ज़ोर देने पर मनोहर जी बोले। बेटा शहर के बाहर जंगल की मुहाने पर मेरा एक छोटा सा कॉटेज है। हर महीने शहर की व्यस्तता से दूर, मैं और तुम्हारी चाची थकान मिटाने के लिए वहाँ कुछ दिन गुज़ारा करते थे। उनके निधन के बाद मेरा फिर कभी मन नहीं हुआ वहाँ जाने का फलस्वरूप वो घर छह महीने तक बंद रहा किसी की सलाह पर। मैंने उसे फॉरस्ट लॉज के रूप में किराये पर देना शुरू किया पर हर बार अजीब वाकया रुकावट बनता रहा। कैसा अजीब वाकया?

4:53 चाचा जी? जीस किसी ने भी वहाँ रात गुजारी। वे चीखते चिल्लाते बाहर निकले। उन्हें वहाँ अजीब अजीब आवाज़े सुनाई दी। वहाँ रहते क्या आपने कभी ऐसा अनुभव किया? नहीं, कभी नहीं। और आज के समय में इन सब पर कौन विश्वास करता है भला? मुझे तो लगता है कोई उस जगत को हॉन्टेड दिखाकर मेरा कॉटेज हड़पना चाहता है। जुगल ध्यान से चाचा जी की बातें सुन रहा था। सच कहूं तो बेटा मेरी अब उस घर में कोई दिलचस्पी नहीं। मैं तो उसे बेच देना चाहता हूँ और इसलिए मैंने एक डीलर को चाबियां भी दे रखी है पर कल जब वो किसी को घर दिखाने के लिए ले गया। तो उन सब को अंदर किसी शक्ति का आभास हुआ। चाचा जी, अगर आप बुरा ना माने तो क्या मैं कुछ दिन वहाँ जाकर रहूँ? जंगल के शांत माहौल में पढ़ाई भी हो जाएगी। और ये सब कौन कर रहा है इसका मैं पता भी लगा लूँगा। मनोहर जी को खामोश देख जुगल बोला। चाचाजी कहीं आप इन सब को सच तो नहीं मान रहे?

6:08 अरे नहीं बेटा, परालौकिक चीजों में मेरा विश्वास नहीं, मुझे यकीन है इन सबके पीछे कोई अराजक तत्व है। पर मुझे चिंता इस बात की है। की वे कहीं तुम्हें कोई हानि ना पहुंचाए आप? बेफिक्र रहे। चाचा जी मैं भी अपने कॉलेज का पहलवान रह चूका हूँ, आप बस मेरे जाने की तैयारी कर दे। ठीक है फिर कल ट्रैन का टिकट कर देता हूँ, 5 घंटे का सफर है। चौकीदार हीरा शाम को आ जाता है। बिमला के लिए पोस्ट ऑफिस फ़ोन कर दूंगा, वो आकर साफ सफाई, खाना वगैरह देख लेगी। पोस्ट ऑफिस क्यों?

6:50 अरे, वहाँ मोबाइल नहीं चलता वैसे मेरे घर पर तो लैंडलाइन फ़ोन है। पर गांव वाले पोस्ट ऑफिस का फ़ोन ही इस्तेमाल करते हैं। सब कुछ समझ बूझकर अगले दिन तड़के सुबह उसने ट्रेन पकड़ी और 12:00 बजे के आसपास कॉटेज पहुँच गया। घने ऊंचे वृक्षों से घिरे। और चिड़ियों की चहचहट से गूंजते उस बियाबान में स्थित वो शांत, गंभीर, दोमंजिला घर ना जाने क्यों उसको एक अजीब सा सुकून दे दिया। अब पता चला क्यों चाचा चाची शहर से भागकर यहाँ आते थे कितनी शांति है यहाँ? तभी उसे दूर से एक औरत आती दिखी। शाहिद, ये बिमला। है। उसका अनुमान सही था। ताला खोल कर वे अंदर घुसे। घर बहुत ज्यादा गंदा नहीं था। बिमला को झाड़ू उठाता देख उसने उसे पहले कुछ खाना बनाने को कहा। बिमला बिना कुछ बोले रसोई में चली गई। चुगर को वो थोड़ी अजीब लगी, शायद उसका यहाँ आने का मन नहीं था। अपना सामान नीचे वाले कमरे में रखकर उसने सोचा घर का एक दौरा कर लिया जाए। नीचे वाले फ्लोर में बैठा किचन और दो कमरे थे। साधारण फर्निचर और जरूरी उपकरणों के अलावा ज्यादा कुछ नहीं था। जुगल को कोने में रखा टेलीफोन दिखा।

8:21 उसने अपना मोबाइल चेक किया तो पाया चाचा सही कह रहे थे, सिग्नल बिल्कुल नहीं था। चाचा को पहुंचने की खबर देने के लिए फ़ोन का रिसीवर उठाया। तो उसे भी डेड पाया। रिसीवर पटक कर वो ऊपर वाले फ्लोर पर गया। वहाँ सिर्फ एक ही कमरा था आश्चर्य बाहर से। देखने पर मुझे ऐसा क्यों लगा यहाँ दो कमरे? हैं। तभी विमला की आवाज़ आई भईया खाना तैयार है। जब तक वो नीचे उतरा, बिमला सफाई खत्म कर चुकी थी। ऊपर वाला कमरा किसी तरह साफ कर वो ये बोलते हुए निकल गई कि रात का खाना बना दिया है और अब वो सुबह ही आएगी। बिमला की जल्दबाजी देख जुगल को हँसी आ गई। लगता है इसे भी ये घर भूतहा लगता है। खाना खाते ही उस पर नींद हावी होने लगी। हीरा तो शाम को ही आएगा, मैं थोड़ा सो लेता हूँ। ये सोचकर वो नीचे वाले एक बैडरूम में जाकर बिस्तर पर फैल गया। काफी देर बाद उसकी आंख खुली। तो देखा अंदर बाहर घोर अंधेरा था, अंगड़ाई लेते हुए उठा और ड्रॉइंग रूम की बत्ती जलाई। उजाला होते ही वो चौंक उठा। सोफे पर 5560 उम्र का एक व्यक्ति बैठा हुआ था। हीरो। अंदर कैसे आए?

9:46 चाबी थी क्या तुम्हारे पास? हाँ बाबू, सारी चाबियां हैं मेरे पास हीरा नहीं बाबू हरी। चाचाजी ने तो शायद हीरा बताया था, चलो हरी ही सही। बाबू? आपने ऊपर वाली मंजिल देखी। देखने के लिए है क्या एक ही कमरा तो है। जुगल के ये बोलते ही हरी हँसते हुए उठ खड़ा हुआ और सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हुए उसे साथ आने को। कहा, आइए आइए। जुगल झुंझला कर उसके पीछे चला। ऊपर जाकर हरि ने दाईं ओर इशारा किया चुगल विस्मित हो गया। ये कमरा तो नहीं था पहले। मुझे पता था आपको नहीं दिखी। ये कहते हुए वह जुगल को अंदर ले गया। कमरे में घुसते ही जुगल की आंखें फटी की फटी रह गई। वह कमरा नहीं एक अच्छी खासी लाइब्रेरी थी। हर दीवार पर किताबों से भरी अलमारिया किताबें पढ़ने का शौक उसे हमेशा से ही था। पर कोर्स की पढ़ाई से समय ही नहीं मिलता था। ये सब मेरे मालिक की हैं। चतुर्जी को पढ़ने का इतना शौक है ये मुझे मालूम नहीं। था। ये कहते हुए जुगल ने एक किताब

11:18 निकाली और वहीं बैठकर पढ़ने लगा। बाबू ये कमरा बहुत गंदा हो गया है, इसकी सफाई कर दूँ क्या? कल बिमला से करवा लूँगा हरी तुम जाओ मुझे ये किताब पढ़ने दो। सुबह दरवाजे पर दस्तक से उसकी आँखें खुलीं। तो खुद को अपने बिस्तर पर पाया। किताब अभी भी उसके हाथ में थी। ऊपर वाले कमरे से अपने बैडरूम तक कब कैसे आया, उसे कुछ याद नहीं। दरवाजा खोलकर देखा, बिमला थी, हरी जा चुका था चाय नाश्ता बनाकर बिमला ने झाड़ू उठाया। तो जुगल ने ऊपर वाला कमरा अच्छे से साफ करने की हिदायत दी। फिर अपने कमरे में जाकर किताब लेकर मग्न हो गया। बिमला को गए काफी देर हो गई थी, श्याम भी घिर आई थी पर जुगल ना तो नहाया धोया था और ना ही उसने खाना खाया था। हाथ वाली किताब खत्म करके जब वह दूसरी किताब लेने ऊपर गया तो देखा कमरा ज्यों का धूँ गंदा पड़ा था। जो शहर की हो। या गांव की सबका एक ही होल है, ये बुदबुदाता हुआ वो स्वयं ही झाड़ू लेकर कमरा साफ करने लगा। तभी उसने देखा दरवाजे पर हरीखड़ा मुस्कुरा रहा है। अब पता चला आप क्यों मालिक को इतना पसंद आए? अरे, ये बिमला बड़ी कामचोर है, ना

12:52 अच्छा खाना बनाती है और ना सफाई करती है। अरे बाबू? छोड़िए सफाई ये लीजिए किताबें पहले इन्हें पढ़िए। हरी के हाथ में किताबें देखकर जुगल बच्चों की भांति चहक उठा। किताबों से उसे लगाव तो था पर किताबों की ऐसी अजीब लत पहले कभी नहीं थी। ऐसा लग रहा था मानो कोई अनजान शक्ति उसके दिमाग पर काबू कर रही हो। हरि के हाथ से किताबें लेकर वह नीचे आया और सोफे पर पसर गया। अचानक उसे कुछ याद आया। और हरी चतुजी को खबर देनी थी। उन्हें तो। कल ही पता चल गया था आप चिंता मत करिए, बस किताबें पढ़िए। यह सुनकर आश्वस्त हुआ जुगल दोबारा किताब में डूब गया। दिन से रात और रात से सुबह होती रही। कब हफ्ता निकल गया? जुगल को पता ही नहीं चला। ना उसे खाने पीने का होश था और ना ही किसी और चीज़ का। मीठे से चिपकी चींटी की तरह दिन रात किताब से चिपका रहता था। विमला को भी उसने डांट कर भगा दिया था। अब सिर्फ वो था, किताबें थी और था हरी। उधर शहर में मनोहर जी का चिंता के मारे बुरा हाल था। इतने दिन हो गए थे पर जुगल की कोई खबर नहीं थी। ना तो घर का फ़ोन लग रहा था और ना पोस्ट ऑफिस का मजबूर होकर।

14:27 रविवार सुबह उन्होंने ट्रेन पकड़ी और पहुँच गए अपने कॉटेज। जुगल। जुगल बेटा। अरे चाचा जी आप अचानक कैसे? जुगल की अस्त व्यस्त हालत देख मनोहर जी चौंक उठे। बेटा क्या हुआ तुम्हे? ये कैसी हालत बना रखी है? तबियत तो ठीक है ना? अरे, चाचा जी? आप अंदर आइए, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। अंदर की हालत देख कर मनोहर जी और अधिक परेशान हो जाते हैं। बिमला नहीं आ रही है क्या? घर की ऐसी हालत क्यों है? अरे वो आपकी बिमला एक नंबर की कमजोर है? मैंने भगा दिया उसे। आप पहले मुझे ये बताइए आपने इस घर की?

15:14 इतनी बड़ी बात मुझसे छुपाई क्यों? कौन सी बात बेटा, कहीं कहीं तुम्हें भी तो यहाँ ऐसा कुछ अनुभव नहीं हुआ? अरे अरे नहीं, चाचा जी या भूत वूत कुछ नहीं है। आइये आप मेरे साथ ज़रा ऊपर चलिए। ये कहकर वह मनोहर जी को ऊपर वाले मंजिल में ले गया। फिर दाईं ओर वाले कमरे में जाकर बोला। इस खजाने के बारे में क्यों नहीं बताया? मनोहर जी आश्चर्य से उसकी ओर देखते हुए बोले। कौन सा खजाना? बेटा क्या बोल रहे हो? जुगल ने किताबों की अलमारी की ओर इशारा किया। ये ज्ञान का खजाना किताबों से भरी अलमारिया मैं तो इसी कमरे में कैद हो कर रह गया हूँ चाचाजी अच्छा हुआ हरी का जो उसने मुझे एक कमरा दिखाया वो आपका वफादार सेवक है। रोज़ आकर पहले मुझे यहाँ से एक किताब निकाल कर देता है। मनोहर जी हतपर्व होकर जुगल को देख रहे थे, जो बाल्कनी में शून्य में हाथ पांव चला रहा था। बेटा कैसी किताबें कौनसी अलमारिया तुम किस कमरे की बात कर रहे हो? हम इस वक्त बाल्कनी में खड़े हैं। पोदी को सामने खुला आसमान पोदा जंगल ऊपर वाली मंजिल पर सिर्फ एक ही कमरा है वो वाला। नहीं नहीं चाचा जी ये देखिए किताबें कितनी किताबें? ये कहकर वो पागलों की तरह हँसने

16:46 लगा। मनोहर जी ने उसे पकड़कर ज़ोर से जोड़ा। चाचा के चिल्लाने और झगझोरने पर जुगल मानो गहरी नींद से जागा। उसकी आँखों के आगे से एक पर्दा हट गया। और उसने पाया वो सही में बाल्कनी में खड़ा था तो वो वो हरी आपका चौकीदार। तुम जीस दिन यहाँ पहुंचे, उसके अगले ही दिन मुझे हीरा का तार मिला, उसकी माँ बीमार थी इसलिए वो छुट्टी लेकर गांव चला गया। और मैंने उसकी जगह किसी और को भेजा भी नहीं लगता है कोई चोर उचक का यहाँ आकर तुम्हें बेवकूफ बना रहा है?

17:32 चाचा जी, उसके आने का समय हो गया है, आप कहीं छुप जाइए, हम उसे रंगे हाथ पकड़ेंगे। मनोहर जी को उपाय सही लगा। प्रतीक्षा करते करते शाम ढल कर रात होने को आई पर कोई नहीं आया। चुगल का चेहरा देख मनोहर जी बोले। कोई बात नहीं बेटा आज नहीं तो कल पकड़ा जाएगा। इतने दिनों में आज पहली बार जुगल का ध्यान ऊपर वाले असली कमरे पर गया। जो हमेशा बंद ही रहता था। चाचा जी, उस कमरे में क्या है? क्या तुम कभी उस कमरे में नहीं गए बेटा?

18:14 ये कहकर उन्होंने कमरे का दरवाजा खोला। कमरा साफ सुथरा और करीने से सजा था। ये घर। असल में तुम्हारी चाची के सबसे बड़े भाई साहब का था। उनकी आकस्मिक मृत्यु के बाद चाची को वसीयत में मिला था। इस कमरे में उनकी सारी चीजें और यादें चाची ने समेट कर रखी थी। यह कहते हुए मनोहर जी ने एक पुराना बक्सा खोला। और उसमें से कुछ मेनस्क्रिप्ट निकाली। उन्हें लिखने का शौक था, काफी अच्छा लिखते थे पर कभी कुछ प्रकाशित नहीं कर पाए। ये देखो उनकी मेनस्क्रिप्ट। ये ये तो वही किताबें हैं जीस, चौकीदार ने मुझे दी थी। तभी मनोहर जी ने बक्से में से कुछ तस्वीरें निकाली। जुगल जुगल ये देखो ये थे बड़े भाई साहब। मनोहर जी की ये बात सुनकर चुगल डरते हुए पीछे मुड़ा। उसे यकीन था फोटो में वही आदमी होगा जिसे वह चौकीदार समझ रहा था। पर ये क्या फोटो तो ऐनेक पहने किसी रॉबली चेहरे वाले शख्स की थी। जुगल चैन की सांस लेने ही वाला था की उसे चाचा के हाथ में एक और तस्वीर दिखी। चाचा जी। वो वो। आदमी आपके भाई साहब के साथ वही आता था यहाँ रोज़ शाम को। यह कैसे हो सकता है?

19:43 ये भाईसाहब का विश्वस्त नौकर था। उनके देहांत के कुछ दिन बाद इसकी उस बाल्कनी से गिरकर मृत्यु हो गई थी। लोग कहते हैं इसने आत्महत्या की थी, पता नहीं सच किया था पर इसका नाम हीरा नहीं। हरि था चतुजी हो सके तो आप ये मेनुसक्रिप्ट प्रकाशित करवा। दें। कहानियों बहुत अच्छी। हैं, मैंने पढ़ी हैं। जुगल के ये कहते ही ज़ोर से हवा चलने लगी और उसे बाल्कनी पर हरी दिखा। हरी ने धीरे से मुस्करा कर अपने हाथ जोड़े। जुगल की बात सुनकर मनोहर जी बोले। हाँ, इतना तो मैं कर ही सकता हूँ भाई साहब के लिए। कुछ सोचते हुए जुगल आगे बोला चाचा जी?

20:34 अब इस कॉटेज को बेचने की। जरूरत नहीं। इसे आप। वेकेशन होम बना दीजिए जो भी जंगल। घूमने आएगा वो इसे किराये पर ले सकता है। आप चिंता मत कीजिए, मैं फॉरस्ट अथॉरिटीज से बात कर लूँगा। पर बेटा अगर फिर किसी ने तंग किया तो? अब कोई तंग नहीं करेगा चाचा जी। आपके भूत की आखिरी ख्वाहिश पूरी हो गई है। ये कहते हुए जुगल ने बाल्कनी की ओर देखा जहाँ हाथ जोड़े और मुस्कुराते हुए हरी धीरे धीरे विलीन हो रहा था। आशा करती हूँ आज की ये कहानी आप सबको पसंद आई होगी क्नॉइस। तो क्या लगता है आपको ये किस्सा था या आपबीती? मुझे इंतजार रहेगा आप सब के कॉमेंट्स और फीड्बैक का आप मुझे मेल भी कर सकते है। लिंक डिस्क्रिप्षन बॉक्स में है।