Jan. 14, 2026

Ateet ka Darwaza/The Red Door

Ateet ka Darwaza/The Red Door
Ateet ka Darwaza/The Red Door
Kuch Kisse Kuch Aapbeeti
Ateet ka Darwaza/The Red Door

During a trip to Rajasthan with her friends and cousin, Charu stumbled upon an old, dilapidated palace hidden from the eyes of time. Inside a massive portrait of a queen dominated the central hall, her features eerily resembling Charu's. Charu sensed a deep connection to the palace-one that seemed to belong to another life. But nothing could have prepared her for the truth waiting behind the Red Door-a destiny that refused to remain forgotten.
Written and Narrated by: Manoshi

0:01 सर्वप्रथम मेरी सारी श्रोताओं को नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएं। मेरी ये कामना है कि ये वर्ष आप सब के लिए मंगलमय हो। कुछ किस्से, कुछ आपबीती में आप सब का स्वागत है। मैं हूँ मानुषी आपकी होस्ट। और इस स्टोरी पॉडकास्ट की वाचक इस नए साल की शुरुआत मैं एक अलग तरीके कहानी से कर रही हूँ दोस्तों, आपको याद होगा सीज़न 1 की दसवीं कहानी। कोहरा सुनकर कई श्रोताओं ने मुझसे अपनी आपबीती साझा की थी। दो चुनिंदा कहानियों में से एक भ्रम के उस पार। मैं बारहवीं एपिसोड में पेश कर चुकी हूँ। आज सुनिए दूसरी चुनी कहानी जिसे भेजा है असम से हमारी एक श्रोता ने, क्योंकि ये कहानी उनकी आपबीती है और उनके वर्तमान जीवन से भी संबंध रखती है। इसलिए उनके गोपनीयता के अनुरोध का सम्मान करते हुए। मैंने कहानी के छात्रों के नाम काल्पनिक रखे हैं। प्रस्तुत कहने की घटना उनके साथ करीब 8 साल पहले घटित हुई थी जब वह अपने मित्र मंडली के साथ राजस्थान भ्रमण बढ़ गई थी। आइए सुनते हैं आज की कहानी जिसका शीर्षक है अतीत का दरवाजा। अरे उठ भी जा चारु और कितना सोयेगी? कज़िन सोनल के झकझोरने पर चारु आंख मलते हुए उठ बैठी। वो आज गए गए हम राजस्थान।

1:32 अलवर। तो बहुत पहले ही क्रॉस कर लिया। बस अब 1 घंटे में जयपुर भी पहुँच जाएंगे। तो इतनी जल्दी क्यों उठा दिया? मुझे सोनल थोड़ा और सोने दे। चारू अभी भी दर्द है क्या? सोनल ने चिंतित होकर पूछा, नहीं, नहीं मैं ठीक हूँ, बिलकुल डर नहीं है। अरे ये तो उठ जाइए, राजकुमारी जी बाहर देखिए कितना प्यारा मौसम है। सोनल के ऐसा कहने पर चारो ने खिड़की का कांच नीचे किया। बाहर से आती मिट्टी की सूंधी महक उसे भीतर तक प्रफुल्लित कर गई। शायद कुछ देर पहले ही बारिश हुई थी। मिट्टी भी खिली थी। वैसे था तो ये सितंबर का महिना पर इस साल गर्मी बहुत पड़ी थी इसलिए बेचारी प्रकृति स्वयं ही अपना समाधान कर रही थी। चारों अपनी मौसेरी बहन सोनल के साथ असम में एक एनजी ओह जलाती थी। साथ ही दोनों बहने शौकिया तौर पर। थिएटर और सिंगिंग शोज भी करती थी। प्रति वर्ष अगस्त सितंबर में उनकी थिएटर कंपनी के नाटकों का मंचन विभिन्न शहरों में होता था। इस वर्ष वह दिल्ली में था। 3 दिन तीन ऑडिटोरियम में नाटक पेश कर वे सब काफी थक गए थे। इसलिए तरो ताजा होने के लिए नाटक मंडली ने राजस्थान टूर का कार्यक्रम बनाया। क्योंकि घर वापसी की फ्लाइट 2 दिन बाद थी। इसलिए लंबा चौरा प्रोग्राम ना बनाकर सिर्फ जयपुर और जोधपुर

3:04 घूमने का प्लान बनाया गया। और हाँ, भरपूर शॉपिंग भी तो करनी थी। चारु को बचपन से ही एक अजीब बिमारी थी। उसे पेट के बाईं तरफ तीव्र दर्द होता था जो कुछ देर रहता फिर बिना किसी दवा या इलाज के अपने आप ठीक हो जाता। उसने कई नामी गिरामी डॉक्टर दिखाएं। मुंबई दिल्ली के बड़े अस्पतालों में एमआरआइ अल्ट्रासाउंड स्कैन सब करवाया। पर सारे रिपोर्ट्स ठीक आए। कहीं कोई बिमारी नहीं थी। टूर पर निकलने से पहले भी उसे दर्द हुआ था और इसलिए वह पूरे रस्ते भर सोती रही। वहीं डॉक्टर्स ने इसे फैंटम पेन जैसा सिंड्रोम बताया पर असली वजह कोई बता नहीं पाया। बाहर की मौसम का आनंद लेती हुई। चारु को एक अजीब सी अनुभूति हो रही थी। हालांकि ये उसकी पहली राजस्थान यात्रा थी। पर न जाने क्यों उसे इस जगह से लगाव एक तरह का अपनापन महसूस हो रहा था मानो वह यहाँ बहुत बार आ चुकी हो। करीब 40 मिनट बाद वह जयपुर में प्रवेश कर गए। सबका भूख के मारे बुरा हाल था। दिल्ली से निकलने के बाद सिवाय चाय स्नेक्स के किसी ने कुछ नहीं खाया था। गाड़ी रोककर एक स्थानीय व्यक्ति से जब उन्होंने अच्छे रेस्टोरेंट का पता पूछा तो उसने अपनी बोली में जवाब दिया किसी को कुछ समझ नहीं आया। पर चारों आश्चर्य रूप से सब समझ गई और उसने उस व्यक्ति को उसी की भाषा में धन्यवाद भी दिया। तुने ये भाषा कब सीखी?

4:36 सोनल ने पूछा तो चारों को भी झटका लगा कि ये उसने कैसे किया? कहाँ वो असम की लड़की जिसने हिंदी भी मुश्किल से सीखी? और कहाँ ये राजस्थान की स्थानीय भाषा उसे अपनी भावनाओं खुद समझ नहीं आ रही थी। सोनम को क्या बताती? अरे बस मैंने अंदाजा लगाया रेस्टोरेंट वासी है जल्दी चलो मुझे बहुत भूख लगी है। ऐसा कहकर उसने बात को टाल दिया। पेट पूजा कर उन्होंने पहले जंतर मंत्र देखा फिर हवा महल की ओर रुख किया। वहाँ पहुंचते ही चारों को फिर से वही दर्द उठा और वह बुरी तरह चटपटाने लगी। उसके दोस्तों ने किसी तरह उसे एक पेड़ के छांव में बैठाया। और चाय पानी बेचने वाली एक औरत से डॉक्टर का पता पूछा। जैसे ही उस औरत की नजर चारू पर पड़ी उसके मुँह से निकला। अरे ई छोड़ी तो अपने पुराने महरनी रानी सज ऐसे दिखे हैं। किसी ने उस औरत की बात में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई क्योंकि वह सब चारु की हालत को लेकर परेशान थे। पर इतने दर्द में भी चारु को यह सुनकर थोड़ा कौतूहल हुआ और जैसे ही दर्द कम हुआ उसने उस औरत से उसकी कही बात का मतलब पूछा जवाब चाहिए। तो भंवर विलासरा पुराने किले में जा चारों थोड़ी सी ठीक हुई। सब जल्दी से गाड़ी में बैठे और हवा महल की तरफ निकल पड़े। चारों ने पीछे पलट कर उस औरत की

6:10 तरफ देखा तो उसने एक रहस्यमय मुस्कराहट के साथ अपने हाथ सिर के ऊपर ले जाकर। को प्रणाम किया। हवा महल देखने के बाद सब ने बाजार का रुख किया, क्योंकि शॉपिंग सब की लिस्ट में पहले नंबर पर थी। शाम के 6:00 बज चूके थे और अगले दिन दिल्ली के लिए निकलना था। इसलिए तय हुआ की यात्रा जयपुर तक ही रखी जाए। ये सुनकर चारू का मुँह उतर गया। उसे तो भंवर विलास जाना था उस औरत की कही बात पुख्ता करने के लिए राजस्थान आकर कोई किला महल नहीं देखा तो क्या घूमे? यहाँ से एक डेढ़ घंटे की दूरी पर भंवर विलास है। चलो ना वहाँ जलते हैं। चारू के इस सुझाव पर लोग दो ग्रुप्स में बैठ गए। कुछ जाना चाहते थे कुछ नहीं। अंततः सबको उसके जिद के आगे झुकना पड़ा और गाड़ी भवर विलास की ओर चल पड़ी। अरे चारू, मैं आप पर डायरेक्शन सीट करना। किधर जाना है पता तो चले गाड़ी चला रहे अमर ने पूछा तो चारु पूरे आत्मबिस्वास से बोली, आरे तू चला?

7:24 मैं बताती हूँ कहा जाना है पहले पांच छे किलोमीटर बिल को सीधा चल फिर दुर्गा मंदिर से बाय लेना। इस तरह बिना मैप देखे चारों ने जब सफलता पूर्वक सबको भवर विलास पहुंचा दिया तो दूसरों से ज्यादा आश्चर्य उसे खुद हुआ क्योंकि उसने इस महल का नाम ही पहली बार सुना था। फिर लोकेशन जानना तो दूर की बात थी वहाँ पहुँचकर महल की दयनीय हालत देख कर। सबको बड़ा अफसोस हुआ। चरवाहों और गड़रियों से घिरे उस छोटी सी जगह पर वह विशाल उजाड़ महल अपने गौरव हीन अतीत का परिचय दे रहा था। ऊपर से स्थानीय लोग इन्हें अजीब नजरों से घूर रहे थे, खासकर चारू को। एक बूढ़ी दादी तो राणे सा राणे सा कहते हुए उसके पैरों पर गिर पड़ी ये सब। इस तरह का अजीब बर्ताव क्यों कर रहे है? सोनल बोली, हम्म ये महल भी बहुत पुराना लग रहा है, उजाड़ भी है, लगता है सरकार इसकी देखरेख नहीं करती। अमर बोला। गाइस तुम लोग आगे चलो, मैं ज़रा बाथरूम हो कर आती। हूँ नहीं, चारु सब साथ चलेंगे तू हो कर आ, हम यहीं पर हैं। सोनल की इस बात पर सभी एकमत हुए। चारों को महल के आसपास कहीं बाथरूम नहीं मिला। तभी उसे दूर दिवार पर एक लाल लोहे का दरवाजा दिखा। बाथरूम समझकर दरवाजा खोलकर वो

8:56 अंदर गई तो वो चौंक गई। अंदर अट्ठारहवीं शताब्दी का माहौल था, कोई महफिल सजी हुई थी, गाना बजाना चल रहा था। सबने राज़ परिवारों जैसे कपड़े पहने हुए थे। वो डरते डरते आगे गयी और किसी से पूछा ये क्या चल रहा है पर उस व्यक्ति ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने एक दो और लोगों से पूछा पर सब संगीत का आनंद ले रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो कोई उसे देख ही नहीं पा रहा था। तभी उसकी नजर सिंहासन पर बैठे पीली पगड़ी बांधे व्यक्ति पर पड़ी। पोषण के व्यवहार से वह कोई राजा या राजकुमार लग रहा था। चारु को वह बहुत पहचाना सा लगा मानो अभी हाल ही में कभी मिली थी। अचानक सब उठ खड़े हुए कोई आ रहा था। संगीत रोक दिया गया। उसने देखा दूर से रात सी पोशाक पहने और लाल रंग की पगड़ी बांधे एक युवक चला आ रहा था। शक्ल सूरत में वह बिल्कुल सिंहासन पर बैठे व्यक्ति का हमशक्ल था। उसे समझते देर नहीं लगी कि ये दोनों जुड़वा थे। लाल पगड़ी वाला युवक चारो के सामने से गुजरा तो उसने एक जलक चारू की और ताका नजरे मिलते ही चारो का चेहरा सफ़ेद बढ़ गया। ये ये तो वो स्वयं थी यही आँखे तो वो रोज़ आईने में देखती थी तो तो क्या मेरे इस महल से कोई पिछले जनम का रिश्ता है?

10:25 अभी वह ऐसा सोच ही रही थी कि वहाँ कोलहल मच गया। आए हुए युवक ने पहले वाले युवक पर आक्रमण कर दिया था। दोनों के बीच तलवार बाजी हो रही थी। फिर देखते ही देखते लाल पगड़ी वाले ने पीली पगड़ी वाले को मौत के घाट उतार दिया। पर इस लड़ाई में वह भी आहत हुआ था। उसके पेट के बाईं तरफ से खून निकल रहा था। ये देख चारों के पेट में तेज दर्द उठा और वह किसी तरह लड़खड़ाते हुए बाहर आई। बाहर आते ही उसका दर्द गायब हो गया और साथ ही वह दरवाजा भी। चारों ने अभी जो सब देखा था, वह उसके अतीत की झलक थी। जिसने उसे अपने जुड़वा भाई की हत्या की थी और तलवार के घाव का दर्द इस जनम में भी भुगत रही थी। घबराई और सहमी जब वह दोस्तों के पास गई तो पाया वे सब अचंभित होकर एक बड़े से पोर्ट्रेट को देख रहे थे, जिसमे बीच में राजमाता बैठी हुई थी। और दोनों तरफ से जुड़वा भाई थे। चारू देख ये तो बिल्कुल तेरी हमशक्ल है। सोनल बोली पर चारू को पता था। वो राजमाता की नहीं बल्कि लाल पगड़ी वाले का पुनर्जन्म थी। वहाँ के स्थानीय लोगों से उन्हें राजवंश की कहानी पता चली। उस वंश में हर पीढ़ी में जुड़वा हुए थे और हर बार सिर्फ एक ही बचना था एक जनम में जो मारता था अगले जनम में वो खुद मारा जाता था, शापित वंश था वो घर वापस पहुंचते ही उसने अपनी माँ को पूछ

11:58 पूछ कर पागल कर दिया। कि कहीं उसके कोई जुड़वा भाई या बहन तो नहीं थे? उसे पूरा यकीन था कि जिसे उसने मारा वह इस जन्म में उसको मारेगा। दिन रात यही सब सोचकर उसे डिप्रेशन हो गया और उसका स्वास्थ्य भी बिगड़ता गया। उसी दौरान उसके मौसा जी की हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई। मौसी हॉउस वाइफ थी और सोनल भी एनजीओ का काम करती थी, इसलिए वह आर्थिक तंगी में आ गए। 1 दिन उसने अपने माता पिता को किसी गंभीर विषय पर आलोचना करते हुए सुना और पूरी बात सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। सोनल उसकी सग्गी बड़ी बहन थी। उसके मौसा मौसी शादी के कई साल बाद तक बे औलाद थे। इसलिए चारु के जन्म लेते ही उन्होंने सोनल को आधिकारिक रूप से गोद ले लिया था। उसके माता पिता यही विवेचना कर रहे थे की मौसा की मृत्यु के बाद किस तरह सोनल की मदद करे क्योंकि आखिर थी तो उन्हीं की संतान। इस खुलासे से चारों के अंदर की सारी दुविधाएं मिट गयी और उसे जन्मो के अभिशाप को खत्म करने का समाधान मिल गया। एक हफ्ते के अंदर ही उसने पिता से विल बनवाई और बड़ा हिस्सा सोनल के नाम करवाया। दोनों बहनों में कजिन के तौर पर हमेशा से ही अपार स्नेह था। जो अब वास्तविकता जानने के बाद और भी प्रगाढ़ हो गया था। आज 7 साल बाद दोनों पार्टनर्स के रूप में न सिर्फ एनजी ओह चला रही थी बल्कि अपने पिता का बिज़नेस भी सफलतापूर्वक संभाल रही थी।

13:37 दोस्तों, ये थी चारों की आपीती आशा करती हूँ आज की ये कहानी आप सबको पसंद आई होगी और ये घटना इस सिद्धांत को बल देती है की टाइम इस नॉट लिनियर पर ये सब हम मनुष्यों की समझ से परे है क्योंकि हमारा मस्तिष्क अभी तक उस आयाम में पहुंचा ही नहीं। पर इस तरह की मैट्रिक्स में गलीच वाली घटनाएं हमें ये सोचने पर मजबूर करती हैं कि हम जो देख रहे हैं क्या वो सच है? मुझे यकीन है आप में से कईयों ने ऐसे अनुभव किए हैं। अगर आप चाहे अपनी आपबीती को शेयर करना तो प्लीज़ हमें ईमेल करें। लिंक डिस्क्रिप्षन में हैं।